मंज़िल से तुक मिलाने वाले शब्द—महफ़िल और मुस्तक़बिल
"रास्ता" सप्ताह का छठा दिन "मंज़िल" है। पिछला दिन "पुल" था।
नौ शब्द, छह सामान्य
मंज़िल की पूर्ण तुक नौ शब्दों की है, और उनमें छह सामान्य हैं: तमिल, अनिल (हवा), अखिल (समूचा), जटिल (उलझा हुआ), महफ़िल (महफ़िल, जमावड़ा), कपिल। बाक़ी तीन हैं सख़्तदिल, सर्पिल (सर्पिल, घुमावदार), और सर्किल।
कल के पुल (दो शब्द) से बड़ी, पर कल से पहले की सड़क (60) से बहुत छोटी। नौ में से छह का सामान्य होना इस हफ़्ते का सबसे ऊँचा अनुपात है।
मंज़िल और महफ़िल
गीतों में यह जोड़ी पहले से चलती आई है, और आँकड़े उसे सही ठहराते हैं: मंज़िल और महफ़िल पूर्ण तुक हैं।
दोनों उर्दू से आए हैं, दोनों "म" से शुरू होते हैं, दोनों "-इल" पर ख़त्म। पहुँचने की जगह और मिलने की जगह।
साथ में जटिल रख दें तो एक और मोड़ बनता है—मंज़िल जटिल, रास्ता जटिल। और सर्पिल (घुमावदार) तो सीधे रास्ते का ही विशेषण है।
मुस्तक़बिल—एक क़दम बाहर
अंतिम 2 अक्षर की तुक में सिर्फ़ दो शब्द हैं, और उनमें से एक इस ब्लॉग में पहले आ चुका है: मुस्तक़बिल (भविष्य)। दूसरा है पत्थरदिल।
मुस्तक़बिल "दिल" सप्ताह के छठे दिन का विषय था, और उस लेख में मंज़िल और महफ़िल दोनों का ज़िक्र था। अब उल्टी तरफ़ से वही जोड़ लौटा है।
मंज़िल और मुस्तक़बिल—पहुँचने की जगह और आने वाला वक़्त। दोनों आगे की तरफ़ देखते हैं।
दिल
एक और बात: सख़्तदिल और पत्थरदिल, दोनों "दिल" पर ख़त्म होते हैं।
यानी "दिल" सप्ताह का शब्द भी इसी ध्वनि-परिवार में है। मंज़िल और दिल की तुक-कुंजी अलग है (मंज़िल दो अक्षरों का है, दिल एक का), इसलिए वे पूर्ण तुक नहीं—पर "-इल" पर ख़त्म होने वाले शब्दों का यह पूरा इलाक़ा आपस में जुड़ा हुआ है।
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